गुरुवार, जून 30, 2011

वक्त का पहिया

वक्त का पहिया


कितना वक्त गुजर गया
फाग नहीं गाया
बरसात में कागज की नाव नहीं बनाई
छिपकर टॉफी नहीं खाई
बाग में अमरूद नहीं तोड़े
नीम की छांव में गुलेल नहीं बनाई
नुक्कड़ पर छोटू की इतनी चाय पी
मां के हाथों की चीनी नहीं महसूसी
कितना वक्त गुजर गया
कोई मेहमान नहीं आया
मुंडेर पर आकर कागा नहीं बोला
...
अब दोपहर में नींद खुलती है
क्योंकि देर रात महफिल सजती है
मुंडेर पर चिडिय़ा नहीं चहचहाती है
नींद के लिए मां की लोरी की जगह
नींद की
गोलियां ली जाती हैं
...
वक्त गुजर रहा है...
वक्त के साथ मैं भी गुजर रहा हूं
खोखला हो रहा हूं, मर रहा हूं
फिर भी मुस्कुरा रहा हूं।

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