गुरुवार, अगस्त 22, 2013

आज घिर आई है बदरिया

बारिश के इस मौसम में हर किसी का मन-मयूर नाच उठता है। प्रकृति के इस आनंद उत्‍सव में हरियाली की चादर भी है और फुहारों की छुअन भी। ऐसे में किसी गीत का जन्‍म होना स्‍वाभाविक है...

आज घिर आई है बदरिया इश्‍क की मेरी छत पर
बरसी हैं लडि़यां पैगाम-ए-महबूब की मेरी छत पर।
बाद-ए-सबा ने झूम के महका दिया दिल का चमन,
उफ!उन आंखों की हया का इंद्रधनुष छा मेरी छत पर।
तड़-तड़ बिजली चमक रही, पवन मचा रहा शोर है,
उनकी मुस्‍कुराहट कर रही अठखेलियां मेरी छत पर।
हमको हिफ्ज़ हैं लव्‍ज-ए-खामोशियां आलाजर्फ की
लरजकर ठिठकने की अदा जवां हुई है मेरी छत पर।
हवा के बोसे कह रहे उन्‍होंने शब भर रची हथेलियां
!रिम‍झिम थम न जाना, जमकर बरस मेरी छत पर।

[हिफ्ज़- (याद, कंठस्‍थ) आलाजर्फ- (बड़े लोग)]

रविवार, अगस्त 18, 2013

लाल किले से महंगाई का बिगुल


प्‍याज ने ऐसा मारा पंच
कि हम हो गए टंच
टमाटर भी खड़ा गुर्रा रहा है
मोहन के मौन पर थर्रा रहा है।
लाल-पीला होकर
अब लाल हो गया है
हर सब्‍जी के दाम में
धमाल हो गया है।
रुपया रोज गिर रहा
राजनीति की तरह
हुई इसकी हालत रिकी बहल
की सताई परणीति की तरह
सोने के दाम भी खरे हो गए हैं
मुझ गरीब के हाल
दाल के फरे हो गए हैं।
सोना की चांदी हो गई
चांदी भी सोना बन गई
खबर मिली है कि
पेटोल कीमत की आंच में
खुद झुलस गया है
आम आदमी के गले में
आम का रस फंस गया है
मंडी में सब्जियां खुश थीं
कि कोई खा नहीं पाएगा
दोपहिया-चौपहिया इठला रहे थे
कि कोई चढ़ नहीं पाएगा।
सरकार ने लाल किले से
बजाया बिगुल
कश्‍मीर तू, मैं कन्‍याकुमारी
पांच साल पहले मैंने तुझे आंख थी मारी
तब फंस गया तू अब फिर आई बारी...!!



शनिवार, अगस्त 10, 2013

'एक टुकड़ा धूप का' का अंतिम भाग


कहानी 'एक टुकड़ा धूप का' का अंतिम भाग

'एक टुकड़ा धूप का' - प्रकाशित कहानी


मेरी यह कहानी 'एक टुकड़ा धूप का' इसी ब्‍लॉग पर टेक्‍स्‍ट के रूप में प्रकाशित है लेकिन यह एक समाचार पत्र में प्रकाशित हुई थी। मैं प्रकाशित कहानी को पोस्‍ट कर रहा हूं।