रविवार, सितंबर 01, 2013

नदी और रिश्‍ते

मैं कहता हूं कि
आखिर क्‍यों
हम नदी के किनारों
की तरह रहते हैं
किनारों के बीच
बहता पानी बनो
क्‍योंकि, रवानी
उसी में होती है
जिंदगानी
उसी में होती है।



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