बुधवार, जून 29, 2011

जिंदगी बता दे हम किधर जाएं

जिंदगी बता दे हम किधर जाएं
जिंदगी बता दे हम किधर जाएं
टूटी हर आस और दिल घबराए

आंसू की धार आंखों से फूटे

साहिल भी छूटा सागर भी छूटे
रिश्तों की रहगुजर पर हम हैं अकेले

लगता है यूं कि सांसों की डोर टूटे
बड़ी दूर है मंजिल बंजर हुई हैं राहें।
जिंदगी बता दे हम किधर जाएं।

वक्त हम पे अब सितम ढाने लगा

मैं पास आऊं मगर तू दूर जाने लगा
धड़कनों की धूप तो अब उतर जाएगी
मौत की मांग में मेरा लहू चढऩे लगा।
दिल का इकतारा यही गीत गाए।
जिंदगी बता दे हम किधर जाएं।
वो सपनों की बातें वो बांहों के घेरे
वो हाथों की सुर्ख मेहंदी, वो गेसू घनेरे
हमने जो खाई थीं संग जीने की कसमें
उन कसमों से कैसे अंखियों को फेरें
हाय हमने क्यूं ये सपने सजाए।
जिंदगी बता दे हम किधर जाएं।

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